The Institutional Politics of Anti-Corruption

Corruption pollutes decision-making, threatens human rights, affects tax-systems, distorts markets, widens inequalities, hinders delivery of goods and services, and blocks access to justice substantially, and turns honest life miserable. The problem persists, with connivance and crafted escape-routes. The lecture will reflect on the rhetoric of anti-corruption in electoral politics for power and the dynamics of institutional politics in actually strategizing it in Indian democracy.

चुनावी होड़ में मतदाताओं को लुभाने के लिए बढ़-चढ़ कर भ्रष्टाचार-उन्मूलन की दावेदारियाँ की जाती हैं। लेकिन हमारे लोकतंत्र में भ्रष्टाचार सत्ता और राजनीति का स्थायी भाव बना रहता है। सरकारें बनती-बिगड़ती रहती हैं, पर भ्रष्टाचार निर्णय-प्रक्रिया को विकृत करते हुए न्याय, पारदर्शिता, मानवाधिकारों और वस्तुओं व सेवाओं की ईमानदाराना आपूर्ति पर काले साये की तरह छाया रहता है। इसका कारण है संस्थागत स्तर पर होने वाली प्रतिगामी राजनीति। व्यवस्था की कुत्सित दरारों में सिर्फ़ राजनीतिक लोग ही नहीं, अनेक ऐसे लोग अपनी पैठ जमाए हुए हैं, जिनके पास भ्रष्टाचार-निरोध के प्रत्येक क़दम को कमज़ोर और अंतत: नाकारा कर देने के हथकंडे हैं। अमिताभ राजन राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य की रोशनी में संस्थागत स्तर पर भ्रष्टाचार-उन्मूलन की रणनीतिक रूपरेखा की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए उन कारणों को रेखांकित करेंगे, जिनके कारण भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शी सरकार और राजनीति अकल्पनीय हो चुकी है।  

Amitabh Rajan is a scholar of sociology of law and one of the senior most IAS officers who has worked in central and state governments. He is credited with the unravelling of irrigation scam in Maharashtra and knows inside-out how the system works and the ways through which anti-corruption framework is subverted. He has written several research papers and authored two books:  Sociology of Human Rights (2002) and Explorations in Local History and Literature (1985).

Abhay Kumar Dubey is Professor at the Centre for the Study of Developing Societies.

Wednesday, 13 December 2017
4 pm, CSDS Seminar Room