कविता का होना:अभिनवगुप्त की दृष्टि में कलासर्जना की प्रक्रिया

प्रस्तुति-सार: भारतीय काव्य-चिंतन में कला-सर्जना की प्रक्रिया पर गहरा विचार किया गया है। अभिनवगुप्त के समग्र साहित्य में इस पर तत्त्व-मीमांसीय, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, संरचनागत दृष्टियों से विशद विमर्श है। कवि की चेतना शब्दों में कैसे ढलती है, इसकी व्याख्या अभिनवगुप्त ने भर्तृहरि आदि द्वारा प्रतिपादित वाक् या वाणी के चार रूपों- परा, पश्यंती, मध्यमा तथा वैखरी - द्वारा की है। लेकिन उन्होंने वाणी के बहिर्यान के इन विविध स्तरों को शैव-दर्शन की तत्तव-मीमांसा से भी जोड़ा है जिससे पश्यंती इच्छाशक्ति से, मध्यमा ज्ञानशक्ति से तथा वैखरी क्रियाशक्ति से संबद्ध हो जाती है। परा वाक् को अभिनव कविप्रतिभा या महेश्वर से अभिन्न मानते हैं। शिव जिस तरह प्रकाशविमर्शमय हो कर स्वातंत्र्य से संसार की सृष्टि करते हैं, वैसे ही कवि अपनी प्रतिभा के स्वातंत्र्य से काव्य की सृष्टि करता है। जिस तरह शिव शक्ति से संवलित होकर विश्व रचते हैं, उसी तरह रचनाकार भी प्रतिभा की शक्ति से संवलित होकर कविता का विश्व रचता है।

वक्ता परिचय: संस्कृत के साहित्यकार और अलंकारशास्त्र के विद्वान आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अध्यापन करने के साथ-साथ राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली के उपकुलपति रह चुके हैं। नाट्यशास्त्र और साहित्यशास्त्र के अध्ययन में विशिष्ट योगदान के लिए बहुचर्चित आचार्य त्रिपाठी ने संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज़ी में 169 ग्रंथों और 237 शोध-प्रपत्रों की रचना की है। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पैंतीस पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं।

मंगलवार, 8 नंवंबर 2016
3 बजे अपराह्न, सीएसडीएस सेमिनार कक्ष